देपालपुर में अतिक्रमण मुहिम बनी दिखावा : विकास शून्य—फुटपाथ रोज़गार पर सीधा प्रहार, परिषद की नीयत पर सवाल
Jivan doliya
Tue, Jan 6, 2026
देपालपुर। नगर परिषद देपालपुर द्वारा 2 जनवरी को इंदौर नाके से पुलिस थाना पुलिया तथा इंदौर नाके से बेटमा नाके तक तथाकथित औपचारिक अतिक्रमण मुहिम चलाई गई। कार्रवाई का दायरा फुटपाथ पर दुकान लगाने वाले छोटे रोज़गारियों, स्थाई दुकानों के बाहर लगे टीनशेड और नालियों के बाहर किए गए अतिक्रमण तक सीमित रहा। लेकिन इस पूरे अभियान में सबसे अधिक शोषण फुटपाथ पर रोज़गार करने वाले अस्थाई दुकानदारों का हुआ, जिनकी आजीविका एक झटके में छीन ली गई, जबकि स्थाई दुकानदारों को केवल अपनी दुकानों के बाहर लगे टीनशेड हटाने की औपचारिकता निभानी पड़ी। नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि अतिक्रमण हटाना बुरा नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि अतिक्रमण हटाने के बाद क्या? नगर परिषद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सीएमओ से जनता सीधा सवाल कर रही है कि क्या इस मुहिम के पीछे कोई ठोस कार्य योजना थी? क्या अतिक्रमण मुक्त हुई जगह पर सड़क चौड़ीकरण, यातायात सुधार, बिजली के पोलों का स्थानांतरण, या बाधक पेड़ों को हटाने की कोई योजना प्रस्तावित की गई? क्या फुटपाथ पर वर्षों से रोज़ी-रोटी कमाने वाले अस्थाई दुकानदारों के पुनर्वास के लिए शॉपिंग कॉम्प्लेक्स या वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया गया? जवाब—शून्य। नगर परिषद देपालपुर की इस कार्रवाई के पीछे न तो कोई विकास मॉडल दिखा, न कोई दीर्घकालीन सोच। इंदौर नगर निगम की तरह, जहां अतिक्रमण मुहिम के पीछे स्पष्ट उद्देश्य और विकास कार्यों की ठोस योजना होती है, देपालपुर में केवल एक साधारण बैठक हुई और बिना किसी रोडमैप के कार्रवाई शुरू कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि नगर में अव्यवस्था बढ़ी, रोज़गार छीना गया और परिषद की कार्यप्रणाली पर सवालों की बाढ़ आ गई। नागरिकों का आक्रोश इस बात को लेकर भी है कि भाजपा की परिषद बनने के बाद प्रथम सम्मेलन में मॉडल रोड निर्माण की कार्य योजना पर मोहर लगी थी। आज परिषद के कार्यकाल को साढ़े तीन साल होने जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर मॉडल रोड निर्माण को लेकर कोई ठोस कवायद तक शुरू नहीं हुई। अब जब अचानक अतिक्रमण मुहिम चलाई गई, तो वह भी बिना किसी विकास दृष्टि के—जिससे यह संदेह और गहरा गया कि यह कार्रवाई योजनाबद्ध विकास नहीं, बल्कि केवल दिखावटी सख्ती थी। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि परिषद वास्तव में विकास चाहती, तो अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ सड़क चौड़ीकरण, यातायात सुधार और वैकल्पिक बाज़ार व्यवस्था को एक साथ लागू किया जाता। इससे न केवल शहर की तस्वीर बदलती, बल्कि नगर परिषद की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होती। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। आज स्थिति यह है कि अतिक्रमण तो हटा दिया गया, लेकिन न शहर संवरा, न यातायात सुधरा और न ही बेरोज़गार हुए छोटे दुकानदारों के लिए कोई समाधान निकला। परिणामस्वरूप नगर परिषद देपालपुर की यह औपचारिक अतिक्रमण मुहिम जनता की नजरों में विकास का प्रतीक नहीं, बल्कि असंवेदनशील प्रशासन और खोखली नीतियों का उदाहरण बनकर रह गई है।
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