हाईवे सुरक्षा नियमों की खुली अनदेखी ? : माचल शराब दुकान पर उठे गंभीर सवाल, आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली कटघरे में
SANDEEP SEN Editor
Tue, May 19, 2026
इंदौर। देपालपुर तहसील के माचल गांव स्थित देशी-विदेशी कंपोजिट शराब दुकान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इंदौर-अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप संचालित हो रही इस शराब दुकान पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन, सड़क सुरक्षा मानकों और आबकारी नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लग रहे हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यह दुकान राष्ट्रीय राजमार्ग से लगभग 100 मीटर की दूरी पर संचालित हो रही है, जबकि उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों एवं समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों के तहत राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों के मुख्य मार्ग और सर्विस लेन से 500 मीटर के भीतर शराब दुकान संचालन प्रतिबंधित माना गया है।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अप्रैल माह से उक्त दुकान का संचालन विधिवत जारी है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि लाइसेंस नवीनीकरण अथवा संचालन अनुमति जारी करने से पूर्व संबंधित विभागों द्वारा स्थल निरीक्षण, दूरी मापन और वैधानिक सत्यापन की प्रक्रिया आखिर किस आधार पर पूरी की गई। यदि नियमानुसार भौतिक सत्यापन नहीं हुआ तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि गंभीर प्रक्रिया संबंधी लापरवाही मानी जा सकती है।
माचल स्थित मां कालका लिकर गैलरी के लाइसेंसी शोभित यादव पिता मूलचंद यादव बताए जा रहे हैं। संचालन संबंधी गतिविधियां सिद्धार्थ यादव द्वारा देखी जा रही हैं, जबकि प्रबंधन धर्मेंद्र जाधव के पास बताया जा रहा है। अब पूरे मामले में शराब ठेकेदार के साथ-साथ आबकारी विभाग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं और नशे में वाहन संचालन की घटनाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों के समीप शराब बिक्री पर प्रतिबंधात्मक निर्देश जारी किए थे। न्यायालय का उद्देश्य यह था कि हाईवे पर यात्रा करने वाले वाहन चालकों की पहुंच से शराब दुकानों को दूर रखा जाए, जिससे दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके। ऐसे में यदि किसी दुकान को प्रतिबंधित परिधि के भीतर संचालन की अनुमति दी गई है तो यह मामला न्यायालयीन आदेशों की भावना के प्रतिकूल माना जा सकता है।
देपालपुर आबकारी वृत्त के उप निरीक्षक भगवानदास अहरवार का बयान भी अब चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने कहा कि “एक बार चेक करवा लेता हूं कि राष्ट्रीय राजमार्ग से शराब दुकान की वास्तविक दूरी कितनी है, उसके बाद ही कुछ बता पाऊंगा।” अधिकारी का यह कथन कई प्रशासनिक सवाल खड़े कर रहा है। जब दुकान का संचालन प्रारंभ हो चुका है तब दूरी की जांच लंबित होना यह संकेत देता है कि अनुमति प्रक्रिया में तकनीकी परीक्षण और वैधानिक परीक्षण को गंभीरता से नहीं लिया गया।
जानकारों का कहना है कि किसी भी शराब दुकान के संचालन से पहले स्थल चयन, सड़क से दूरी, पहुंच मार्ग, राजमार्ग की स्थिति और भू-राजस्व अभिलेखों का परीक्षण आवश्यक माना जाता है। इसके अतिरिक्त संबंधित विभाग द्वारा फील्ड निरीक्षण रिपोर्ट, नक्शा सत्यापन और राजस्व अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही अनुमति दी जानी चाहिए। यदि इन प्रक्रियाओं की अनदेखी हुई है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो सकती है।
सूत्रों के अनुसार मामले को लेकर क्षेत्र में व्यापक नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का आरोप है कि आबकारी विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों की कथित मिलीभगत के कारण नियमों को दरकिनार कर शराब दुकान संचालित करवाई जा रही है। यही कारण है कि अब निगाहें आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना, इंदौर संभाग आबकारी उपायुक्त इंदर सिंह जामोद, कलेक्टर शिवम वर्मा तथा सहायक आबकारी आयुक्त अभिषेक तिवारी की आगामी कार्रवाई पर टिक गई हैं।
यदि जांच में हाईवे से दूरी संबंधी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो शराब दुकान का लाइसेंस निरस्त करने, संचालन पर रोक लगाने तथा अनुमति प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तक की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल यह मामला पूरे आबकारी तंत्र की पारदर्शिता, वैधानिक प्रक्रिया और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बनता जा रहा है।
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