सीएम साहब, ये कैसा सम्मान? बख्तावर सिंह की जयंती अंधेरे में : राजा बख्तावर सिंह की जयंती या प्रशासन की चुप्पी का उत्सव?
Jitendra Chouhan Reporter
Mon, Dec 15, 2025
अंधेरे में राजा को श्रद्धांजलि! सरकार और प्रशासन की अनदेखी पर सीधे सवाल
धार। 1857 के प्रथम क्रांतिकारी महाराव राजा बख्तावर सिंह की जन्म जयंती पर अमझेरा में जो दृश्य सामने आया, उसने सरकार और प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। देश के लिए हंसते-हंसते बलिदान देने वाले वीर योद्धा की प्रतिमा और खंडहर में तब्दील ऐतिहासिक किला पूरे कार्यक्रम के दौरान अंधेरे में डूबा रहा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राज्य केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर को भी राजा बख्तावर सिंह को अंधेरे में ही श्रद्धांजलि अर्पित करनी पड़ी। यदि मंत्री के आगमन पर भी रोशनी की व्यवस्था नहीं हो सकी, तो आम जनभावनाओं की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
किले के भीतर आयोजन से क्यों रोका गया?
राजा बख्तावर सिंह की जन्म जयंती पर ग्राम पंचायत द्वारा किले के भीतर साज-सज्जा और प्रकाश व्यवस्था की तैयारी की जा रही थी, लेकिन पुरातत्व विभाग ने हस्तक्षेप करते हुए पंचायत को किले के अंदर किसी भी प्रकार की व्यवस्था करने की अनुमति नहीं दी। नतीजा यह हुआ कि किले के बाहर मेला लगा रहा और भीतर राजा का महल और प्रतिमा अंधेरे में उपेक्षित पड़े रहे।
यह सवाल अब जनता पूछ रही है कि आखिर पुरातत्व विभाग को किसके इशारे पर यह निर्णय लेना पड़ा? क्या ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का अर्थ यह है कि शहीदों और क्रांतिकारियों के सम्मान पर ही रोक लगा दी जाए?
वर्षों से उपेक्षित है बख्तावर किला
अमझेरा का बख्तावर किला वर्षों से बदहाली का शिकार है। न तो इसके संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना बनी और न ही इसके विकास के लिए बजट की कोई झलक दिखाई दी। अब स्थिति यह है कि नगरवासी अपने आराध्य राजा की जन्म जयंती भी गरिमापूर्ण तरीके से नहीं मना पा रहे हैं।
साफ-सफाई तक की अनुमति नहीं
सरपंच प्रतिनिधि शिवम मकवाना ने बताया कि पुरातत्व विभाग ने किले के गेट के भीतर साफ-सफाई तक के लिए हस्तक्षेप नहीं करने दिया। काफी प्रयासों के बाद ग्राम पंचायत ने जैसे-तैसे सफाई करवाई, लेकिन लाइटिंग और डेकोरेशन की अनुमति नहीं मिली।
सरकार से सीधे सवाल
क्या 1857 के क्रांतिकारी राजा बख्तावर सिंह का सम्मान करना भी नियमों के विरुद्ध है?
जब वर्षों से किला खंडहर बना हुआ है, तो जन्म जयंती पर सजावट से किसे खतरा था?
क्या सरकार और पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी केवल रोक-टोक तक सीमित रह गई है?
अमझेरा में अंधेरे में दी गई यह श्रद्धांजलि सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर एक कड़ा तमाचा है। सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में भी राजा बख्तावर सिंह की विरासत इसी तरह अंधेरे में रखी जाएगी?
जनभावनाओं पर भारी नियम-कानून?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि राजा बख्तावर सिंह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि अमझेरा की पहचान और स्वाभिमान हैं। ऐसे में उनकी जन्म जयंती पर किले के भीतर दीप-प्रज्वलन, प्रकाश व्यवस्था और श्रद्धांजलि कार्यक्रम रोकना सीधे तौर पर जनभावनाओं का अपमान है। लोगों का सवाल है कि यदि वर्षों से किला खंडहर बना हुआ है और वहां कोई नियमित संरक्षण कार्य नहीं हो रहा, तो एक दिन की सजावट और रोशनी से विरासत को क्या खतरा हो सकता था?
मंत्री की मौजूदगी में भी नहीं बदली व्यवस्था
राज्य केंद्रीय मंत्री सावित्री ठाकुर का कार्यक्रम पहले से तय था, इसके बावजूद प्रशासन और पुरातत्व विभाग ने कोई विशेष व्यवस्था नहीं की। मंत्री को भी अंधेरे में प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करने पड़े। यह दृश्य अपने आप में प्रशासनिक संवेदनहीनता की गवाही देता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मंत्री की उपस्थिति भी अधिकारियों को सक्रिय नहीं कर सकी, तो आम नागरिकों की सुनवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
किले का संरक्षण या कागजी जिम्मेदारी?
बख्तावर किले को संरक्षित स्मारक घोषित किए जाने के बाद से ही यहां विकास कार्य लगभग ठप पड़े हैं। न तो मरम्मत हुई, न पर्यटन की कोई योजना बनी। केवल कार्यक्रमों पर रोक और पंचायत को हस्तक्षेप से दूर रखना ही विभागीय सक्रियता बनकर रह गई है। नगरवासियों का आरोप है कि पुरातत्व विभाग ने संरक्षण के नाम पर सिर्फ तालेबंदी और मनाही की नीति अपनाई है।
ग्राम पंचायत के प्रयास हुए विफल
ग्राम पंचायत द्वारा सीमित संसाधनों में साफ-सफाई और श्रद्धांजलि कार्यक्रम को गरिमा देने का प्रयास किया गया, लेकिन विभागीय अड़चनों के चलते ये प्रयास अधूरे रह गए। सरपंच प्रतिनिधि शिव मकवाना का कहना है कि बार-बार आग्रह के बावजूद किले के भीतर बिजली, लाइटिंग या सजावट की अनुमति नहीं दी गई।
सरकार से अपेक्षा या मजबूरी?
स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वह नियमों के साथ संवेदनशीलता का भी संतुलन बनाए। 1857 के क्रांतिकारी राजा बख्तावर सिंह की स्मृति को सम्मान देना किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश का दायित्व है। अब सवाल यह नहीं है कि कार्यक्रम क्यों नहीं हुआ, बल्कि सवाल यह है कि क्या सरकार आने वाले समय में इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण, प्रकाश व्यवस्था और विकास के लिए ठोस कदम उठाएगी या फिर हर वर्ष राजा बख्तावर सिंह की जयंती यूं ही अंधेरे में गुजरती रहेगी?
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